<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7272770</id><updated>2011-04-21T15:53:22.475-07:00</updated><title type='text'>نقايض الخيّاميّه و ساير الهزليّات</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://khayyami.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7272770/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khayyami.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>mitilat</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08872053363062023124</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>1</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7272770.post-108991654771561489</id><published>2004-07-15T10:16:00.000-07:00</published><updated>2004-07-15T11:35:47.716-07:00</updated><title type='text'>سایر الهزلیّات </title><content type='html'>&lt;p dir="rtl" align="center"&gt;&lt;font face="tahoma"&gt;		&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					     از &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;font face="tahoma" color="#FF0000"&gt;&lt;strong&gt;میتیلات&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			 &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;				   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;font face="tahoma" color="#0000FF"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		                    « ... که فسق در همه جا یُمنی عظیم دارد ! »&lt;br /&gt;			&lt;br /&gt;							      &lt;strong&gt;عبید ِ زاکان&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;						            ( صد پند ، ش 90 )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;	هزل ( در جامعه ای که گروش ِ ریا آن را با بدترین طرد و طعن ها &lt;br /&gt;فسق فرا می نماید ) نوعی حرکت ِ درونی به سوی ِ چیرگی بر غرور و تعصّب و خامی است ، و ازین رو گونه ای سلوک ِ بی واسطه به شمار می رود.&lt;br /&gt;								&lt;strong&gt;میتیلات&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;							           امرداد 77 &lt;br /&gt;		 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			          &lt;strong&gt;( 1 )&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                         &lt;strong&gt;اندر مذاکره . به یاد عبید ِ زاکان &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;شبی کیر با کُس به نجوای ِ گرم &lt;br /&gt;همی گفت کای تنگ ِ شیرین چو جان &lt;br /&gt;من این قامت ِ همچو شمشاد و سرو&lt;br /&gt;ز بهر ِ تو پرورده ام سالیان &lt;br /&gt;نگه کن که تا شاد گردد دلت &lt;br /&gt;به آب افتدت هر زمانی دهان &lt;br /&gt;تمامت وجود ِ من ازآن ِ توست &lt;br /&gt;بگیرش دمادم چو جان در میان &lt;br /&gt;که صافی تر از من نه در عشق هست&lt;br /&gt;میاسا دمی وُ غنیمت بدان &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;شنیدم که کُس تنگ تر گشت و گفت : &lt;br /&gt;منم آن که بخشیده  جان در جهان &lt;br /&gt;اگر صاف و نا صاف ، زان ِ منی &lt;br /&gt;تو را دوست دارم ؛ همیشه بمان &lt;br /&gt;به درگاه ِ ما چون به پا خاستی &lt;br /&gt;دهیمت درین قصر ِ فرّخ ، مکان &lt;br /&gt;شب و روز قدر ِ تو دانسته ایم &lt;br /&gt;ز پروردگانی وُ از راستان &lt;br /&gt;ولیکن زبان در کش و شو خموش &lt;br /&gt;بیا بر درم کش ، چه جای ِ زبان &lt;br /&gt;فرو شو درین قصر ِ فرخنده چهر &lt;br /&gt;برون آی باز و دگر رَه  بران &lt;br /&gt;که ما را خوشی زین شد و آمد است&lt;br /&gt;نه سیری بُوَد گر بُوَد جاودان &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;درین بین کون ناله ای کرد زار &lt;br /&gt;که ای کُس دگر بیش قصّه مخوان &lt;br /&gt;به تنگیّ ِ من گر تو باشی ، رواست &lt;br /&gt;فروشی اگر فخر بر آسمان&lt;br /&gt;ز بس خایه بوسیده ام خسته ام &lt;br /&gt;دلم گشته محزون و کاهد روان &lt;br /&gt;مرا نیز سهمی بداده  ز کیر&lt;br /&gt;مهین ِ رسل ، ختم ِ پیغمبران &lt;br /&gt;مگر باشی ای کیر کافر که باز &lt;br /&gt;بگردانی از من رخ ِ خویش ، هان !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;چو کیر این حکایت شنید ، ایستاد &lt;br /&gt;زمانی مردّد بدین هردُوان &lt;br /&gt;بگفتا پس ای جان و جانان ِ من &lt;br /&gt;زهم دست دارید اندر زمان &lt;br /&gt;ره ِ چاره آسان ، چه جای ِ نزاع &lt;br /&gt;کنون کم کنم این نفیر و فغان &lt;br /&gt;شبی خانه در ساحت ِ کُس کنم &lt;br /&gt;شبی کون بُوَد مر مرا میزبان &lt;br /&gt;	ازآن شب دگر کون و کُس همجوار &lt;br /&gt;	پذیرای ِ کیرند شادی کنان !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					تیر ماه 1369 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;strong&gt;( 2 )&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		در خیابان دلبران بسیارباشند و مرا &lt;br /&gt;		سوی ِ ایشان میل ِ بسیارست و هستم شرمْ رو&lt;br /&gt;		خواهم ار با دلبری مقصود ِ دل واگو کنم &lt;br /&gt;		عاجزم ، گویی که می بندد کسم راه ِ گلو &lt;br /&gt;		تا به جایی که کنم نفرت ز حال ِ خویشتن &lt;br /&gt;		باغ در باشد کسی و اینهمه شیرین هلو &lt;br /&gt;		وانگه از وی ساخته نبود چشیدن طعم ِ آن ؟&lt;br /&gt;بر چنین بی دست و پایی صد هزاران کن تفو !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;باید از فردا نهال ِ شرم از بن برکَنَم &lt;br /&gt;کز نهال ِ شرم ناید حاصل و سود ای عمو &lt;br /&gt;دیگر ار آید به چنگم خوشْ کُسی شیرین چو قند &lt;br /&gt;در یکی لحظه کنم کیرم به صد جایش فرو&lt;br /&gt;		آن نباشد که به ناکامی چو از او بگذرم &lt;br /&gt;		آن طرف تر گویم ای فریاد ، صد حیف از کُسو!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;						27/4/69 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;strong&gt;( 3 )&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			فدای ِ آن بر و باسن شوم من &lt;br /&gt;			سراپا کیری از آهن شوم من &lt;br /&gt;			پناه آرم به سوراخ ِ کُس و کون &lt;br /&gt;			ز شخْ درد ِ جهان ایمن شوم من !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;						1375&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;strong&gt;( 4 )&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;				   &lt;strong&gt;قصیده ی ِ مروارید&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			بسم الله الرّحمن الرّحیم &lt;br /&gt;			دارم شخْ درد ِ کُست از قدیم &lt;br /&gt;			بهر ِ کُس و کون تو حیران منم &lt;br /&gt;			طالب ِ آن چشمه ی ِ حیوان منم &lt;br /&gt;			سی و چل آمد به میان زاد ِ من&lt;br /&gt;			اُشتر و خر رشگْ بر ِ گاد ِ من &lt;br /&gt;			شحنه ی ِ کیرم چو غضب می کند &lt;br /&gt;			کون و کُس از معرکه تب می کند &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			دان که من از عرش فرود آمدم &lt;br /&gt;			زان سوی ِ میدان ِ خلود آمدم &lt;br /&gt;			تا چه مرا از وطن آواره کرد &lt;br /&gt;			چرت ِ خداوندی ِ من پاره کرد &lt;br /&gt;			بوی ِ کُس و کون به سحرگاه ِ تنگ &lt;br /&gt;			با دل ِ سودا زده آمد به جنگ &lt;br /&gt;			کیر ِ خری یافتم از کردگار &lt;br /&gt;			تا که برآرم ز کُس و کون دمار&lt;br /&gt;					عرش رها کردم و کیرانهْ سر &lt;br /&gt;					سوی ِ زمین آمد و شد خرْ بشر !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;							12-10 بهمن ِ 1375&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;					( 5 )&lt;br /&gt;			              سیّد ِ شرق&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;							دی سیّد ِ شرق با غلامی &lt;br /&gt;							کز بار ِ غمش خمیده قدّم &lt;br /&gt;							بر خاک نهاده سینه ، می گفت: &lt;br /&gt;							یک بار ِ دگر؛ به حقّ ِ جدّم !&lt;br /&gt;								&lt;em&gt;&lt;strong&gt;شمس ِ طبسی&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			سیّد ِ شرق ملِک زاده بُوَد &lt;br /&gt;			هر که بینی تو ورا گاده بود &lt;br /&gt;			در به پرونده ی ِ اعمالاتش &lt;br /&gt;			کون ِ ناداده و هم داده بود &lt;br /&gt;			خوشگل آخوندک ِ خوبی بوده ست &lt;br /&gt;			زین سبب ،لابد، بس داده بود &lt;br /&gt;			بچّه آخوند چو خوشگل باشد &lt;br /&gt;			کون ِ او سفره ی ِ بگشاده بود&lt;br /&gt;			هر که بینی تو ورا گاییده ست&lt;br /&gt;			وانکه ناگاده ملَک زاده بود !&lt;br /&gt;			باور ار می نکنی ، پرس ز شیخ  &lt;br /&gt;			کاو بسی بارش بنهاده بود &lt;br /&gt;			باز، آلِش عمل ِ شیخان است &lt;br /&gt;			علّتش نیز بسی ساده بود &lt;br /&gt;			حجره ی ِ تنگ و دو کون در بر ِ هم &lt;br /&gt;			شب چو آید ، ذکر استاده بود &lt;br /&gt;			یا که خود این چو شود آماده &lt;br /&gt;			آن دگر نیز هم آماده بود&lt;br /&gt;			هنر ِ حوزه بود دادن ِ کون &lt;br /&gt;			مجتهد ، رتبه ی ِ واداده بود &lt;br /&gt;					چند گویی که نمی دانستی &lt;br /&gt;					« سیّد ِ شرق » ملک زاده بود ؟!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;							4/4/76&lt;br /&gt;	&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;strong&gt;( 6 )&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			بسم الله الرّحمن الرّحیم &lt;br /&gt;			ای به کُست کیر و عذاب ِ الیم&lt;br /&gt;			کیر، ازیرا که نیازت بُوَد &lt;br /&gt;			وان دگر از بس که تو نازت بود &lt;br /&gt;			چند به کُس سربفرازی  که من ؟!&lt;br /&gt;			کیر ِ سرافراشته ام دست زن&lt;br /&gt;			تا که بدانی که عمودی ست ژرف&lt;br /&gt;			بهر ِ کُس و کون ِ تو چیزی شگرف&lt;br /&gt;			کلّه ی ِ او خر به فغان آوَرَد&lt;br /&gt;			پیرزن ِ مرده به جان آوَرَد &lt;br /&gt;			کافر و از حوزه ی ِ اسلام دور &lt;br /&gt;			نیز بسی مایل ِ اهل القبور &lt;br /&gt;			تا بکَنَد سنگ ِ سر ِ گورشان &lt;br /&gt;			مست بگاید همه مستورشان &lt;br /&gt;			با سر و سرچشمه ی ِ کفری چنین &lt;br /&gt;			خیز و بیا ضربه ی ِ کیرم ببین &lt;br /&gt;			یک شب اگر با تو و شُرب ِ مدام &lt;br /&gt;			خلوتی افتد بسپوزم تمام &lt;br /&gt;			بردَرَم آن جایگه ِ ناز ِ تو &lt;br /&gt;			نیز همان حقّه ی ِ طنّاز ِ تو&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			دخترکا ! بنده ز شخْ درد مُرد &lt;br /&gt;			کیر ِ چنین نیز ندانی تو خورد &lt;br /&gt;			خیز و براین شانه بنه پای ِ خود &lt;br /&gt;			باز کن آن جایگه ِ جای ِ خود &lt;br /&gt;					تا چو سرش رفت مکرّر کنیم:&lt;br /&gt;					« بسم الله الرّحمن الرّحیم » ! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;						   20-19و22 اَمرداد ِ 77 &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;strong&gt;( 7 )&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;			گفتم به رفیق ِ خویش روزی &lt;br /&gt;			هشدار که پیش ِ من نگوزی &lt;br /&gt;			گفتا چه کنم که کون گشاد است&lt;br /&gt;			طبل ِ شکمم چو خیک ِ باد است &lt;br /&gt;			گفتم بگذار چوب پمبه &lt;br /&gt;			یا بوق ِ مرا به سان ِ چمبه &lt;br /&gt;					القصّه به فکرم آفرین کرد &lt;br /&gt;					بوق ِ من ازآن دوان گزین کرد !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;							20/11/77 &lt;br /&gt;					&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;strong&gt;( 8 )&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		کیر ِ مستی گر به کون ِ مست ِ دیگر رفت ، رفت &lt;br /&gt;		تا به خایه درفشرد و تا به آخر رفت ، رفت &lt;br /&gt;		صبح گر شرمندگی و اعتذاری بود ، بود &lt;br /&gt;		ور فراموشی فزود و آن ز خاطر رفت ، رفت !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;							76 یا 77&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;strong&gt;( 9 )&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			دانش آموز  وعده اش تخمی است &lt;br /&gt;			چون که می گوید و نمی آید&lt;br /&gt;			لیک اگر گویی اش بیا و بده &lt;br /&gt;			بال و پر از عقاب برباید &lt;br /&gt;					حیف ، پیر است و لاغر است و چَغَل&lt;br /&gt;					کون ِ او خرس هم نمی گاید !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;	28/2/79 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;strong&gt;( 10 )&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;				کیری دارم که خر ندارد &lt;br /&gt;				خر این اندازه ذکر ندارد &lt;br /&gt;				از بهر ِ وجود ِ اقدس ِ او &lt;br /&gt;				کرّه خر و ماچه خر ندارد &lt;br /&gt;				کیر و کُس و کون و هر چه کاف است &lt;br /&gt;				بدْهد ، بکند ، خبر ندارد &lt;br /&gt;				صد بار گرش به کون ببندی &lt;br /&gt;				کون پاره کند ؛ حذر ندارد &lt;br /&gt;				چون بر در ِ کُس نهد سر ِ خویش &lt;br /&gt;				کُس ناله کند ؟ – اثر ندارد ! &lt;br /&gt;				بس کون و کُس از ستم دریده است &lt;br /&gt;				خود بر که که او ظفر ندارد !؟&lt;br /&gt;				موقوفه ی ِ اهل ِ جِدّ و تقوا ست &lt;br /&gt;				وین قوم ازو گذر ندارد &lt;br /&gt;				کون های ِ سپید ِ خود بیارید &lt;br /&gt;				ای اهل ِ خدا ، ضرر ندارد &lt;br /&gt;				ما گر نکنیم ، کیر ِ خر هست &lt;br /&gt;				این هست و اگر مگر ندارد &lt;br /&gt;					کیری زان سان که سوزنی گفت: &lt;br /&gt;					« کیری دارم که خر ندارد ! »&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;							شهریور ِ 75&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;strong&gt;( 11 )&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		هر شب که مه برآید ، کیر از سر ِ طرب &lt;br /&gt;		دیوانه وار پاره هزاران رسن کند &lt;br /&gt;		گه در خیال ِ کُس بُوَد و گاه کون و باز &lt;br /&gt;		آن جنگ ها که با کُس و کون تن به تن کند &lt;br /&gt;		کُس فوج فوج خندد و کون را زند کنار &lt;br /&gt;		کون خویش را به تنگی ِ خود ممتحَن کند &lt;br /&gt;		ای کون و کُس ! مدیح ِ شما می رود همی &lt;br /&gt;		هرگه که کیر و خایه ی ِ من انجمن کند &lt;br /&gt;		« گر برکنم دل از تو و بردارم از تو مهر »   &lt;br /&gt;		کیرم ز ناله خشتک ِ من پر حَزَن کند &lt;br /&gt;		« ور هیچ چاره کرد ندانم غم ِ تو را »  &lt;br /&gt;		جلق ِ دودستی آید و ختم ِ سخن کند &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		« گفتم چنان که گفت هنرمند ِ »  ناشناس &lt;br /&gt;		بیتی که شعر ِ ناب ازو کسب ِ فن کند: &lt;br /&gt;				« کیرم ز بی کُسی در ِ مسجد فتاد و مُرد &lt;br /&gt;				یک مؤمنی نبود که او را کفن کند ! »  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;							17 خرداد ِ 75 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;strong&gt;( 12 )&lt;/strong&gt;  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		سخت در حیرتم ای شیخ بدین سیرت ِ زشت &lt;br /&gt;		گل ِ منحوس ِ وجود ِ تو چرا وُ که سرشت &lt;br /&gt;		باورم نیست خدا خلق ِ تو جاکش کرده است &lt;br /&gt;		که ندارد دگری چون تو چنین نکبت و زشت &lt;br /&gt;		یا شبی دیو کشیده ست به بر مادرکت &lt;br /&gt;		یا خود ابلیس ِ لعین تخم ِ تو در مزبله کِشت &lt;br /&gt;		...&lt;br /&gt;		رشته ی ِ عمر ِ شما پای ِ طرب را بسته ست &lt;br /&gt;		ور نه با گلشن ِ گیتی چه نیازی به بهشت !؟&lt;br /&gt;		در روایت نسب ِ شوم ِ شما با که رسد ؟ &lt;br /&gt;-	مادرش گاد ، که این سلسله را پشم برشت !&lt;br /&gt;دین ِ تو نکبت و کارت همه احرار کشی ست &lt;br /&gt;هیچ دد همچو تو آیین ِ شرارت ننوشت &lt;br /&gt;		شعر ِ ما بیت به بیتش خط ِ آزادی ِ ما ست &lt;br /&gt;		می زند گور ِ تو را نفرت ِ ما خشت به خشت !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;						13/3/75 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			&lt;strong&gt;( 13 )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;	             چار پاره ی ِ سه کاف &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;کُس نیمه شب به فِس فس ِ آرام &lt;br /&gt;در گوش ِ کیر ناله ی ِ عشّاق می کند &lt;br /&gt;کون می پرد ز خواب و بناگاه : غَرت ، غَرت &lt;br /&gt;صد فحش ِ تر حواله ی ِ عشّاق می کند !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;				16/11/81 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		&lt;strong&gt;( 14 ) &lt;br /&gt;	       نو پهلوانی&lt;br /&gt;	 ( یا : های کن ِ ایرانی ) &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		( 1 )&lt;br /&gt;       &lt;strong&gt;خسرو و شیرین و فرهاد &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;شیرین کُس ِ خویش باد می زد &lt;br /&gt;خسرو سر ِ کیر چرب می کرد &lt;br /&gt;فرهاد ز دور داد می زد !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		( 2 )&lt;br /&gt;       &lt;strong&gt;خسرو و شیرین و فرهاد&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;شیرین ، کُس ِ همچو نوش ازو بود &lt;br /&gt;خسرو، همه حرف ِ توش ازو بود &lt;br /&gt;فرهاد ِ نگون ، خروش ازو بود !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;						16/11/81 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;				&lt;strong&gt;( 15 )&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		در نمازم چو ز خم کردن ِ تو یاد آمد &lt;br /&gt;		حالتی رفت که آب ِ چُل ِ فرهاد آمد &lt;br /&gt;		از چل ِ کافرم اکنون طمع ِ صبر مدار &lt;br /&gt;		کآن تخرخُر  که تو دیدی شد و، پر باد آمد &lt;br /&gt;		کیر ساقی شد و کُس ها همه کونْ مست شدند &lt;br /&gt;		موسم ِ گای ِ پس و پیش به بنیاد آمد &lt;br /&gt;		بوی ِ بهبود ز اوضاع ِ جهان می شنوم &lt;br /&gt;		جرج بوش آمد و دل زآمدنش شاد آمد  &lt;br /&gt;		ای عروس از ذکر ِ سخت شکایت منمای &lt;br /&gt;		کون و کُس پاک بیارای که داماد آمد !&lt;br /&gt;		دلبران ِ دگران پنبه به باسن بستند &lt;br /&gt;		زید ِ ما بود که با کون ِ خداداد آمد &lt;br /&gt;		گیر دارند کسانی که کُس و کون گایند &lt;br /&gt;		ای خوش آن کیر که جلقی شد و آزاد آمد &lt;br /&gt;				شاطر از دسته ي ِ پارو به درم نه ذکری &lt;br /&gt;				تا بگویم که ز تین ایجری ام یاد آمد !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;							12 فروردین ِ 82 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			  &lt;strong&gt;اصل ِ غزل ِ حافظ &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		در نمازم خم ِ ابروی ِ تو با یاد آمد &lt;br /&gt;		حالتی رفت که محراب به فریاد آمد &lt;br /&gt;		از من اکنون طمع ِ صبر و دل و هوش مدار &lt;br /&gt;		کان تحمّل که تو دیدی همه بر باد آمد &lt;br /&gt;		باده صافی شد و مرغان ِ چمن مست شدند &lt;br /&gt;		موسم ِ عاشقی و کار به بنیاد آمد &lt;br /&gt;		بوی ِ بهبود ز اوضاع ِ جهان می شنوم &lt;br /&gt;		شادی آورد گل و باد ِ صبا شاد آمد &lt;br /&gt;		ای عروس ِ هنر از بخت شکایت منمای &lt;br /&gt;		حجله ي ِ حسن بیارای که داماد آمد &lt;br /&gt;		دلفریبان ِ نباتی همه زیور بستند &lt;br /&gt;		دلبر ِ ماست که با حسن ِ خداداد آمد &lt;br /&gt;		زیر ِ بارند درختان که تعلّق دارند &lt;br /&gt;		ای خوشا سرو که از بار ِ غم آزاد آمد &lt;br /&gt;			مطرب از گفته ي ِ حافظ غزلی نغز بخوان &lt;br /&gt;			تا بگریم که ز عهد ِ طربم یاد آمد  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;				&lt;strong&gt;( 16 ) &lt;br /&gt;		شوخی با رودکی ، پدر ِ شعر ِ پارسی  &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		بوی ِ کُس از هر کران آید همی &lt;br /&gt;		بوی ِ کون خود بیش از آن آید همی &lt;br /&gt;	کون ِ آن بت زیر ِ پای ِ کیر ِ شخ &lt;br /&gt;	چون لحاف ِ پرنیان آید همی &lt;br /&gt;	آب ِ کیرم از نگاه ِ کون ِ دوست &lt;br /&gt;	شُرّ و شُر ، بی گایمان آید همی &lt;br /&gt;	هی بخاران کون ِ خویش و شاد باش &lt;br /&gt;	کیر زی تو شادمان  آید همی &lt;br /&gt;	كير ماه است و سرین ات آسمان &lt;br /&gt;	ماه سوی ِ آسمان آید همی &lt;br /&gt;	کیر مار است و کُس ِ تو آشیان &lt;br /&gt;	مار توی ِ آشیان آید همی &lt;br /&gt;				آفرین بر کون ِ تنگ ِ دوست باد &lt;br /&gt;				گر به کُس اندر زیان آید همی !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;						16 فروردین ِ 82 &lt;br /&gt;	&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			   &lt;strong&gt;اصل ِ قصیده ي ِ رودکی&lt;/strong&gt;  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			بوی ِ جوی ِ مولیان آید همی &lt;br /&gt;			یاد ِ یار ِ مهربان آید همی &lt;br /&gt;			ریگ ِ آموی و درشتی راه ِ او &lt;br /&gt;			زیر ِ پایم پرنیان آید همی &lt;br /&gt;			آب ِ جیحون از نشاط ِ روی ِ دوست &lt;br /&gt;			خنگ ِ ما را تا میان آید همی &lt;br /&gt;			ای بخارا ، شاد باش و دیر زی &lt;br /&gt;			میر زی تو شادمان آید همی &lt;br /&gt;			میر ماه است و بخارا آسمان &lt;br /&gt;			ماه سوی ِ آسمان آید همی &lt;br /&gt;			میر سرو است و بخارا بوستان &lt;br /&gt;			سرو سوی ِ بوستان آید همی &lt;br /&gt;					آفرین و مدح سود آید همی &lt;br /&gt;					گر به گنج اندر زیان آید همی &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;				    &lt;strong&gt;( 17 ) &lt;br /&gt;			         باز هم رودکی !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			شاد زی با سپید کونان  شاد &lt;br /&gt;			که جهان نیست غیر ِ گاداگاد &lt;br /&gt;			گاده را شادمان بباید بود &lt;br /&gt;			زان سپس در پی ِ نگاده فتاد &lt;br /&gt;			کون ِ آن نوجوان ِ غلمان ْ روی &lt;br /&gt;			کُس ِ آن ماه روی ِ حورْ نژاد &lt;br /&gt;			من و آن کون که او ندارد موی &lt;br /&gt;			من و آن کُس که او نگشته گشاد &lt;br /&gt;			چون کنی کون و کُس ، به شکرانه &lt;br /&gt;			دادن ِ خویش را مبر از یاد &lt;br /&gt;			نیک بخت آن کسی که داد و بکرد &lt;br /&gt;			شور بخت آن که او نه کرد و نه داد   &lt;br /&gt;			عمر کوته بُوَد چو گای ِ خروس &lt;br /&gt;			چون خروسان مدام باید گاد ! &lt;br /&gt;					حاصل ِ عمر چیست ؟ مستی و گای &lt;br /&gt;					مست می گای ؛ هرچه بادا باد !! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;						    16 فروردین ِ 82 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;	&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;				&lt;strong&gt;اصل ِ غزل ِ رودکی  &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;				شاد زی با سیاه چشمان  شاد &lt;br /&gt;				که جهان نیست جز فسانه و باد &lt;br /&gt;				زآمده شادمان بباید بود &lt;br /&gt;				وز گذشته نکرد باید یاد &lt;br /&gt;				من و آن جعد ْ موی ِ غالیه بوی &lt;br /&gt;				من و آن ماهروی ِ حور نژاد &lt;br /&gt;				نیکبخت آن کسی که داد و بخورد &lt;br /&gt;				شوربخت آن که او نه خورد و نه داد &lt;br /&gt;						باد و ابر است این جهان ِ فسوس &lt;br /&gt;						باده پیش آر، هر چه بادا باد !  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;strong&gt;( 18 ) &lt;br /&gt;				بازسُرایی ِ قطعه ای از:&lt;br /&gt;      بندار ِ رازی &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;	در تعلیقه ي ِ« هزّالان ِ ادب ِ پارسی » در معرفی ِ شاعر ِ بزرگ و نام آور ِ سده ي ِ چهارم : بندار ِ رازی ، دو نمونه شعر نقل کرده ام ؛ دوّمی قطعه ای است که به گویش ِ محلّی ِ خود [ گونه ای از فارسی که – گویا – از برخی جهات میانه ي ِ پهلوی و فارسی ِ دری بوده و در سرزمین های ِ غربی ِ ایران ِ بزرگ رواگ داشته ] سروده است. شعری است بسیار زیبا ، که دین ستیزی ِ وی را بدرستی نشان می دهد. &lt;br /&gt;	امروز، 19/1/82 ، در میان ِ برخی اوراق به قطعه ای برخوردم که 26/3/80 گفته شده ، و باز سرایی ِ همین شعر ِ بندار است ؛ قدری امروزی تر. و صد البتّه : &lt;br /&gt;				میان ِ شعر ِ من با شعر ِ بندار &lt;br /&gt;				تفاوت قدر ِ شَعر و شِعر باشد !&lt;br /&gt;	چون در آن تعلیقه نمی گنجد ، اینجا می آورم: &lt;br /&gt;				روزی آخوندی در شابدولظیم &lt;br /&gt;				سر ِ منبر گهر ِ دین می سُفت &lt;br /&gt;				که همه جای ِ بدن روز ِ جزا &lt;br /&gt;				دهد اقرار بر اعمال ِ نهفت   &lt;br /&gt;				زنکی بر کُس ِ خود می زد مشت  &lt;br /&gt;				کای بسا کُس که تو کُس خواهی گفت !!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                 &lt;strong&gt;چند یادداشت&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;                                    قطعه ی شماره ی&lt;br /&gt;                                  &lt;strong&gt;5&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;                    شیخ - دوست و هم حجره ی سیّد شرق              &lt;br /&gt;                                   &lt;strong&gt; 9&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;                     :این بیت از پاسخ ِ دوست عزیز است &lt;br /&gt;                      گفته ای پیر و لاغر و چغلم&lt;br /&gt;                      پس چرا پشت ِ خود دهی بغلم !؟&lt;br /&gt;                                    &lt;strong&gt;11&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;                  مصرع ها از مسعود ِ سعد ؛ پاره مصرع از م . امید ؛ و بیت از حکیم لاادری است.&lt;br /&gt;                                     &lt;strong&gt;15&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;                                  تخرخُر ، مصدر ِ جهلی است ، از خُرخُر&lt;br /&gt;                                      &lt;strong&gt;16&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;                   به جای « شادمان آید همی » می توان « شخ دوان آید همی » گذاشت&lt;br /&gt;                                      &lt;strong&gt;17&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;                     اصل ِ غزل ِ رودکی ، دو سه بیت ِ دیگر هم دارد که نقل نکرده ام&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                              &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;strong&gt;تعلیقات&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;	&lt;strong&gt;( 1 )&lt;/strong&gt; مذاکره . بیت ِ 16 : مرا نیز سهمی بداده ز کیر &lt;br /&gt;	       در کتب ِ تواریخ ِ صدر ِ اسلام ، و سیر و تفاسیر، آمده است که نرینگان ِ مکّیان بعضاً با مادینگان ِ خویش از طریق ِ « دُبُل » ( = دُبُر = کون ) نیز مجامعت همی کردندی ؛ و پس از هجرت ، برخی از ایشان با مادینگان ِ مدنی وصلت به هم رسانیده و خواستندی که همچنان از دبل ِ نیز بهره برندی ، و آن مادینگان به دم ِ ایشان نیامدندی و کون ِ خود دو دستی بچسپیدندی و گای ِ پسینه ندادندی . و چون نرینگان ِ دبل دوست ِ مکّی به زور جماعیدندی ، مادینگان ِ مدنی شاکی شدندی به حضرت ِ ختمی مرتبت ؛ و پس آنگاه وحی ِ بیامدی که پارسی ِ آن ایدون بُوَدی : « زنان ِ شما کِشت ِ شما اند ؛ بیایید به کشت ِ شما هر چگونه که خواهید ... » ( بقره ، 223 . از ترجمه ي ِ تفسیر ِ طبری ، ج 1 ص 139 ) 	     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       آیه ، البت دو پهلو ست و تا به امروز در باب ِ آن نتیجه و برداشتی یک سویه به حاصل نیامده است . آنان که به دُبُل رغبتینایی دارند به قید ِ « هر گونه » می چسپند ، و مخالفان ِ کون به لفظ ِ « کشتزار » !   &lt;br /&gt;	اگر از بنده پرسان کنید می جوابم که : گای ِ پسینه – چه با مادینه و چه با نرینه ي ِ کم زاد – زاد و پیشینه ای به قدمت ِ انسان دارد . بدان روزگار که آدمی اندکی می فهمید امّا هنوز چاردست و پا راه می رفت ، به وقت الگای، نرینه کون ِ مادینه را بغل همی کردی و به سبب ِ قرابت ِ این دو گای ْ جای، گهگاه ذکر به دبل نیز همی شدی . ( در حقیقت ، درآن روزگاران ِ دور، قُبُل و دُبُل در یک سمت واقع می شده است !! )  &lt;br /&gt;	 واقع ِ امر این است که  در این یک فقره اجازه ی ِ نرینگان قطعاً به دست ِ مادینگان است . مولانا عبید می گوید : « مولانا عضد الدّین به خواستاری ِ خاتونی فرستاد. خاتون گفت : من می شنوم که او فاسق است و غلامباره ، زن ِ او نمی شوم. با مولانا بگفتند ؛ گفت : با خاتون بگویید از فسق توبه توان کرد و غلامبارگی به لطف ِ خاتون و عنایت ِ او باز بسته است ! »      ( رساله ی ِ دلگشا )&lt;br /&gt;	&lt;strong&gt;( 4 )&lt;/strong&gt; قصیده ی ِ مروارید. این نام را از منظومه ای برگرفته ام که [ نام ِ اصلی ِ آن « جامه ی ِ فخر » است و ] مولانا عبدالحسین ِ زرّین کوب آن را در کتاب ِ « ارزش ِ میراث ِ صوفیّه » [ پیوست ؛ ص 8-284 ] نقل فرموده . این قصیده « در نیمه ی ِ دوّم ِ قرن ِ دوّم ِ میلادی به زبان ِ سُریانی انشاء شده است . » به تصوّر ِ نگارنده ( میتیلات ) مضمون ِ « جامه ی ِ فخر » ، « تعلّق ِ روح به عالم ِ عُلوی ، و اشتیاق ِ بازگشت بدان عالم » است ، که مشخّص ترین باور ِ گنوسی است . ( برای ِ این نحله ، بنگرید به : لغت نامه، ذیل ِ « گِنُستیسیسم » ، یا مأخذ ِ آن : کریستن سن ؛ ایران در زمان ِ ساسانیان ) &lt;br /&gt;	       همچنین ، در این مثنوی ِ کوتاه ، به  فروید  نظر داشته ام و این که : آلت ِ تناسلی ، نقطه ی ِ اتّصال ِ آدمی به جهان ِ هستی است !&lt;br /&gt;	       ضمناً این مثنوی نظیره یا نقیضه ای برای ِ آغازه ی ِ « مخزن الاسرار » ِ نظامی نیز تواند بود : &lt;br /&gt;					بسم الله الرّحمن الرّحیم &lt;br /&gt;					هست کلید ِ در ِ گنج ِ حکیم &lt;br /&gt;	&lt;strong&gt;( 5 )&lt;/strong&gt; سیّد ِ شرق . « آماده » لطیفه ای دارد : دو شاگرد نقّاش در طبقه ای از یک بنای ِ تازه ساز دیوار رنگ می کنند . دو سه ساعتی از شب گذشته ، برق می رود . بناچار به جاخواب – که  عبارت است از قطعه کارتنی باز شده – می روند و دراز می کشند . ده دقیقه ای می گذرد . یکی از ایشان زمزمه می کند : من آماده ام . و دیگری می گوید : من هم آماده ام . اوّلی می گوید : من آماده ی ِ آماده ام ، و دوّمی می گوید : من هم آماده ی ِ آماده ام . اوّلی می گوید : من کاملاً آماده ی ِ آماده ام ؛ و دوّمی می گوید : من آماده ی ِ آماده ی ِ آماده ام ... و بناگهان برق می آید : هر دو شلوار ِ خود را پایین کشیده اند و هریک کون ِ خود را به دیگری کرده است ! و زبان ِ حال ِ ایشان ، این عامیانه : ( بیت ) &lt;br /&gt;					از داده وُ نداده &lt;br /&gt;					آماده ایم ، آماده !   &lt;br /&gt;	&lt;strong&gt;( 14 )&lt;/strong&gt; نو پهلوانی .&lt;br /&gt;	مولانا اخوان ِ ثالث ، نظر به قطعه شعر ِ ناب ِ بازمانده از پَهلبَد ِ مَروْزی سراینده و خنیاگر ِ بزرگ و نامدار ِ دوره ي ِ ساسانی [ که آن را « خسروانی » خوانده اند ] نموده و به پیروی ِ وی ، چند شعر ِ بسیار زیبا در قالب ِ سه گانی -  و البتّه به وزن ِ عروضی -  سروده و آن ها را « نو خسروانی » نامیده است . ( برای ِ « خسروانی » ِ بازمانده ي ِ پهلبد ، بنگرید به : 1-  موسیقی ِ شعر ؛ از مولانا استاد شفیعی کدکنی ، ص 561 و بعد . 2- وزن ِ شعر ِ فارسی ؛ از مولانا خانلری ، ص 55 . [ البتّه وی نامی برای ِ این شعر نیاورده . ] 3- بدایع و بدعتها  و عطا و لقای ِ نیما یوشیج ؛ از مولانا اخوان ، ص 605 و بعد .4- ... / و برای ِ « نو خسروانی » های ِ اخوان ، بنگرید به : دوزخ امّا سرد . ) &lt;br /&gt;	نگارنده که در نام ِ « خسروانی » برای ِ شعر ِ پهلبد ، با بزرگواران اختلاف ِ نظر دارم و آن را « پهلوانی » می نامم ( و این موضوع را در یادداشتی بلند که به زودی آماده ي ِ نشر خواهد شد ، باز نموده ام . ) به « نو پهلوانی » قائل شده ام.	بی نیاز از یادآوری است که « های کُن » که به نقیضه ي ِ « هایکو » ي ِ ژاپنی ها ست اختصاص به هزل دارد ! &lt;br /&gt;	( ... ) در نگارش ِ انجامه – ترقیمه ( = اسپری شد این کتاب ... ) که اینک عکس ِ آن را خواهید دید ، به ترقیمه ي ِ نسخه ي ِ منحصر به فرد ِ « ترجمان البلاغه » ي ِ محمّد بن عمر رادویانی ، به خط و قلم ِ ابوالهیجا [ با کنیه ي ِ ما : ابوالهجا ، اشتباه نشود ! ] اردشیر بن دیلمسار ِ نجمی ِ قطبی ِ شاعر ، دوست و شاگرد ِ اسدی ِ توسی ، که اسدی کتاب ِ « لغت فُرس » را به خواهش ِ وی تألیف نموده ، نظر داشته ام . ( برای ِ ملاحظه ي ِ عکس ِ این ترقیمه ي ِ زیبا – و نیز عکس ِ برگ ِ نخست ِ این نسخه – و لذّت بردن از خطّ ِ نسخ ِ کهن ِ اردشیر ِ دیلمسار ، بنگرید به کتاب ِ ارزنده ي ِ « تاریخ ِ نسخه پردازی ... » از مولانا نجیب ِ مایل ِ هروی ، ص 539 و 542 . به گُمانم پرفسور مولانا احمد ِ آتش ، همراه با چاپ ِ حروفی ِ« ترجمان البلاغه » ، عکس ِ کلّ ِ نسخه را نیز عرضه نموده است . متأسّفانه این نابودمند از این کتاب نسخه ای نداریمی .)&lt;br /&gt;	□&lt;br /&gt;	تقلید ِ خطّ ِ اردشیر ِ دیلمسار ، البتّه میسّر نشد ؛ که فرموده اند : &lt;br /&gt;				کار ِ هر چُل نیست کون بسپوختن &lt;br /&gt;				کیر ِ شخ می خواهد و صد فوت و فن !  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;							فروردین 82 . &lt;strong&gt;میتیلات&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;	       این هم عکس ِ انجامه – ترقیمه ي ِ نابودمند : میتیلات &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                           که متأسّفانه اثری از آثارش نیست ؛ چون راه ِ آوردن ِ تصویر را نمی دانم&lt;br /&gt;	&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;			&lt;strong&gt;نمایه ي ِ منابع و مراجع و مآخذ &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;	&lt;br /&gt;	ایران در زمان ِ ساسانیان ؛ کریستن سن . ترجمه ي ِ رشید یاسمی .&lt;br /&gt;	اقطار القطبیّه ( رک : تعلیقات ِ اصل ِ ترانه ها ؛ ش 30  ) . &lt;br /&gt;	ازین اوستا ؛ م . امید ( اخوان ثالث ) انتشارات ِ مروارید . &lt;br /&gt;	از پست و بلند ِ ترجمه ؛ کریم امامی . نیلوفر ، اوّل ، 1372 . &lt;br /&gt;	ارغنون ؛ م . امید . مروارید . &lt;br /&gt;	ارزش ِ میراث ِ صوفیّه ؛ زرین کوب . امیر کبیر . &lt;br /&gt;	بدایع و بدعتها  و  عطا و لقای ِ نیما یوشیج ؛ م . امید . بزرگمهر .&lt;br /&gt;	پیشاهنگان ِ شعر ِ پارسی ؛ محمّد دبیر سیاقی . شرکت ِ سهامی ِ کتابهای ِ جیبی .&lt;br /&gt;	تاریخ ِ نسخه پردازی ... ؛ نجیب ِ مایل ِ هروی . &lt;br /&gt;	تذکره الشّعرا ؛ امیر دولتشاه ِ سمرقندی . چاپ ِ محمّد ِ رمضانی . &lt;br /&gt;	تذکره ي ِ میخانه ؛ ملا عبد النّبی فخرالزّمانی . تصحیح ِ احمد ِ گلچین ِ معانی . &lt;br /&gt;	ترجمه ي ِ تفسیر ِ طبری . تصحیح ِ حبیب ِ یغمایی .&lt;br /&gt;	چراغ ِ هدایت ( فرهنگ ِ فارسی ) ؛ خان آرزو . [ همراه ِ غیاث اللّغات ]&lt;br /&gt;	چهار مقاله ؛ نظامی ِ عروضی ِ سمرقندی . تصحیح ِ محمّد ِ معین .&lt;br /&gt;	خمسه ي ِ نظامی . چاپ ِ بازاری ِ امیر کبیر . &lt;br /&gt;	دوزخ امّا سرد ؛ م . امید .&lt;br /&gt;	دیوان ِ انوری . تصحیح ِ سعید ِ نفیسی .&lt;br /&gt;	دیوان ِ انوری . تصحیح ِ مدرّس ِ رضوی . &lt;br /&gt;	دیوان ِ ایرج میرزا . ( جیبی . هدیه ي ِ خسرو ) .&lt;br /&gt;	دیوان ِ حافظ . ( چند چاپ ) . &lt;br /&gt;	دیوان ِ سوزنی . ( مشخّصات را به یاد ندارم . ) .&lt;br /&gt;	دیوان ِ شفایی اصفهانی . تصحیح ِ عبدالعلی بنان . &lt;br /&gt;	دیوان ِ ظهیر ِ فاریابی . به اهتمام ِ حاجی شیخ احمد ِ شیرازی . &lt;br /&gt;	دیوان ِ مسعود ِ سعد . تصحیح ِ رشید یاسمی . &lt;br /&gt;	دیوان  ( اشعار ِ بازمانده ي ِ ) مهستی گنجوی . به اهتمام ِ طاهری شهاب .&lt;br /&gt;	دیوان ِ یغما جندقی . به اهتمام ِ سید علی آل داود . &lt;br /&gt;	رباعیّات ِ خیّام . ( رک : پیشانه ي ِ « تعلیقات ِ اصل ِ ترانه ها » ) &lt;br /&gt;	رساله ي ِ دلگشا . ( ← کلّیّات ِ عبید ِ زاکانی ) &lt;br /&gt;	سخن و سخنوران ؛ فروزانفر .&lt;br /&gt;	شاعران ِ بی دیوان .تصحیح ِ  محمود ِ مدبّری . &lt;br /&gt;	صحاح الفرس . تصحیح ِ عبدالعلی طاعتی . &lt;br /&gt;	طربخانه . یار احمد ِ رشیدی . تصحیح ِ همایی .&lt;br /&gt;	فرهنگ ِ فارسی ِ معین . &lt;br /&gt;	فرهنگ ِ کوچک ِ زبان ِ پهلوی ؛ دیوید نیل مکنزی . ترجمه ِ مهشید ِ میر فخرایی .&lt;br /&gt;	کلّیّات ِ عبید ِ زاکانی . چاپ ِ انتشارات ِ اقبال .&lt;br /&gt;	کلّیّات ِ عبید ِ زاکانی . تصحیح ِ محمّد جعفر ِ محجوب . امریکا .&lt;br /&gt;	لطایف الطّوایف ؛ فخر الدّین علی صفی . تصحیح ِ گلچین ِ معانی . &lt;br /&gt;	لغت فرس . تصحیح ِ مجتبایی / صادقی .&lt;br /&gt;	لغت نامه . &lt;br /&gt;	المعجم ؛  شمس ِ قیس ِ رازی . تصحیح ِ قزوینی . مجدد : مدرّس ِ رضوی . &lt;br /&gt;	موسیقی ِ شعر ؛ محمّد رضا شفیعی کدکنی . &lt;br /&gt;	نزهه المجالس ؛ جمال ِ خلیل ِ شروانی . تصحیح ِ محمّد امین ریاحی . &lt;br /&gt;	وزن ِ شعر ِ فارسی ؛ خانلری .&lt;br /&gt;	هزلیّات ِ فوقی یزدی . تصحیح ِ مدرّس ِ گیلانی . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;	□&lt;br /&gt;	یادآوری ِ پایان : گذشته از اندک موارد ِ نادرستی ِ حروف نگاری که ممکن است وجود داشته باشد ، دو مورد ِ اساسی هست که درآن خلاف ِ نظر ِ خویش عمل کرده ام و این از راه ِ ناچاری بوده ، چون برنامه ي ِ فارسی ِ مورد ِ استفاده ي ِ من کمبود دارد : 1- نشانه ي ِ اضافه در واژه های ِ پایان یافته به « های ِ بیان ِ حرکت » مانند ِ خانه و  ... ، که ناچار به صورتِ « ي ِ » آمده ؛ در حالی که باید با همزه می آمد .2- چند مورد واژه ي ِ عربی هست که باید به « تای ِ گرد ِ دو نقطه » نوشته شود و من پیدا نکردم و ناچار  « ه » آورده ام . 3- « عجالتاً » هم باید با تای ِ گرد نوشته می شد که نشد ! &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;		 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;					&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7272770-108991654771561489?l=khayyami.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khayyami.blogspot.com/feeds/108991654771561489/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7272770&amp;postID=108991654771561489' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7272770/posts/default/108991654771561489'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7272770/posts/default/108991654771561489'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khayyami.blogspot.com/2004/07/blog-post.html' title='&lt;p dir=&quot;rtl&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;font face=&quot;tahoma&quot; color=&quot;#FF0000&quot;&gt;سایر الهزلیّات &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;'/><author><name>mitilat</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08872053363062023124</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
